जो टहनी अथवा बीज, अपने मूल वृक्ष/ फल से कट कर मिट्टी में नहीं घुल मिल जाए तो उसका अस्तित्व नहीं बचता। जब तक फ्रीजर / कोल्ड स्टोरेज में रहे, तब तक ठीक, उसके बाद खेल खत्म।

यही हाल हुआ है सनातन धर्म को अपना मूल ना मानने और भारतीय संस्कृति रूपी मिट्टी में नहीं घुलने वालों का। जब तक ठंडे बस्ते में रहे, काम चल गया, अब स्वयं को पेड़ समझने लग गए, पतन प्रारम्भ।

​यह अध्यात्म और धर्म से दूर जाकर एक religion बनने की प्रकिया है | जो भी व्यक्ति थोड़ी सी बुद्धि लगाएगा, उसको समझ आ सकता है| 

Every branch of tree (sanatan dharm) can continue to call itself a tree only till it’s connected.

When cut off in search of new identity, invoking kaliyug (creating new ism), it’s good as a wood for making furniture and not for flowers & fruits (adhyatm).

For all new isms – something to reflect on.