विद्या की पिपासा “एजुकेशन” से नहीं, ज्ञान से शान्त होती है।
पेट की अग्नि “पिज़्ज़ा” से नहीं, माँ की बनाई घर की रोटी से तृप्त होती है।
खरीदारी का आनन्द “मॉल” से नहीं, नगर के पुराने बाज़ार की रौनक से है।
खेल का आनन्द “टच स्क्रीन” में नहीं, मिट्टी की सोंधी महक में है।
कथा का रस “बिग बॉस” में नहीं, रामायण के मधुर प्रसंगों में है।
राखी की मिठास “कैडबरी” में नहीं, घर के बने लड्डुओं के स्वाद में है।
दीवाली का प्रकाश चीनी झालरों से नहीं, घर के आँगन में जलते तेल के दीयों से है।
विवाह का सौंदर्य “फ़ैशन” से नहीं, शील और संस्कार के श्रृंगार से है।
आत्मा की तृप्ति भोग से नहीं, भक्ति, प्रेम और योग से है।
संसार की “गूगल” में नहीं, श्रीराम और माता सीता के चरणों में है।
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