सनातन धर्म की शक्ति ऐसी है कि जो भी भारत के हित में कार्य करेगा, उसकी रक्षा के लिए धर्म स्वयं ही आगे आ जाएगा। धर्म नदी की तरह निर्मल और गतिशील है; आवश्यकता पड़ने पर वह अपना मार्ग बदल लेता है, क्योंकि उसका अंतिम लक्ष्य समुद्र में विलीन होना है, चाहे रास्ता कोई भी अपनाना पड़े।

आज हम ‘सत्यमेव जयते’ का उद्घोष इसलिए कर पाते हैं क्योंकि सनातन परंपरा में कर्म से अधिक उद्देश्य को प्राथमिकता दी गई है। इसी उद्देश्य-पूर्ति के लिए भगवान कृष्ण ने न केवल कर्ण के रथ के कीचड़ में फँसने पर उसका वध करने के लिए अर्जुन को प्रेरित किया, बल्कि स्वयं भी रणछोड़ कहलाए। उन्होंने जरासंध से संघर्ष टालने और व्यापक उद्देश्य की रक्षा के लिए मथुरा छोड़कर द्वारका बसाई। भगवान राम ने भी सुग्रीव के हित में, उद्देश्य सिद्धि हेतु वाली का वध पीछे से किया।

ये घटनाएँ सनातन धर्म की उस गहरी अंतर्दृष्टि को दर्शाती हैं जहाँ कर्मकांड और रूढ़ि से अधिक महत्त्व धर्म के वास्तविक उद्देश्य को दिया गया है। हमारे शास्त्रों ने भी व्यक्ति को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं किया है, अपितु उसे समयानुकूल अपने विवेक और बुद्धि के उपयोग हेतु प्रेरित किया है। यही सनातन धर्म की विशेषता और उसके चिरस्थायी प्रभाव का रहस्य है।