नहीं 1 करोड़ नहीं ले सकेंगे, क्षमा करें क्योंकि अन्य लोगों के भी योगदान का महत्व है, भले ही वे 1 रुपया देते हो

जब मैं पहली बार गुरुकुल गया था, वहाँ गुरुकुल के वित्त प्रबंधन पर कुछ बात चली। गुरुकुल के संचालक आचार्य जी और एक महान विदुषी माताजी का संवाद चल रहा था। आचार्य जी ने कहा, उनके एक मित्र है जो बहुत धनी है और गुरुकुल की सहायता करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होने 1 करोड़ रुपए की सहायता राशि देने का सोचा।

यह सुन मैंने आस पास देखा और फिर लगा कि यहाँ 1 करोड़ किसी ने दिए हो, ऐसा लगता तो नहीं। इस कारण जानने कि और जिज्ञासा हुई। आचार्य जी ने जो आगे बताया, वह सुनकर मेरे होश नहीं रेह गए, दो मिनट के लिए ऐसा लगा कि मैं कहाँ आगया?? क्या मैं कलियुग में ही जी रहा हूँ?

आचार्य जी के कहा कि मैंने मित्र से क्षमा मांग ली कि यह राशि नहीं ले सकेंगे !!! हमारे खर्च केवल 1.5 लाख रुपये महीने आता है, 1 करोड़ का क्या करेंगे?

उनके तो मित्र ने कहा, अच्छी बात है, हर महीने 1.5 लाख का प्रबंध कर लूँगा, क्या वह ले सकेंगे?

आचार्य जी ने फिर मना किया, अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए फिर क्षमा मांग ली।

फिर मित्र ने पूछा ऐसी क्या बात है?

आचार्य जी ने कहा, हर महीने कई पचासों लोग आकार 100, 200, 500 इत्यादि यथा सामर्थ्य योगदान देकर जाते है। अब यदि आपके 1.5 लाख ले लू तो उनकी भावना का अपमान होता है। मेरी गुरुकुल में ऐसे अनेक छोटी मोटी सेवा करने वाले सेवा पारायण जन आते है। उनके एक एक कण योगदान को ग्रहण कर, यह गुरुकुल विद्यार्थी को नि:शुल्क शिक्षा देता है।

मित्र ने अब अपनी पराजय स्वीकार करते हुए, पूछा – तो मैं कहा अपना योगदान दे सकता हूँ?

आचार्य जी ने कहा, हर महीने के अंत में जितना हमारा घाटा होता हो, उतना योगदान दे देना, बस उससे ज़्यादा कुछ नहीं !!!

इस दिन ने बाद से, कभी भी शिक्षक के लिए आदर्श का मन में आता है तो यही संस्मरण आता है …

धन्य है भारत भूमि !!